लोक शब्द सस्कृत धातु लोक् से जन्मा है जिसका मतलब होता है नज़र डालना, देखना अथवा प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करना । इससे बने संस्कृत के लोकः का अर्थ हुआ दुनिया , संसार। मूल धातु लोक् में समाहित अर्थों पर गौर करें तो साफ है कि नज़र डालने , देखने अथवा प्रत्यक्ष ज्ञान करने पर क्या हासिल होता है ? जाहिर है सामने दुनिया ही नज़र आती है। यही है लोक् का मूल भाव। लोक् से जुड़े भावों का अर्थविस्तार लोकः में अद्भुत रहा । पृथ्वी पर निवास करने वाले सभी प्राणियों मे सिर्फ मनुश्यों के समूह को ही लोग कहा गया जिसकी व्युत्पत्ति लोकः से ही हुई है। वाशि आपटे के शब्दकोश के मुताबिक लोकः का अर्थ मानव समूह, मनुश्य जाति, समुदाय, समूह, समिति, प्रजा, राष्ट्र के व्यक्ति आदि है।
संसार के अर्थ में लोक ने स्थूल भाव ग्रहण किया । लेकिन जब इसके प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने वाले अर्थ पर मानव ने अमल किया तो कई परिकल्पनाएं भी होने लगीं। तीन लोकों की कल्पना हुई स्वर्ग लोक, पृथ्वीलोक और पाताल लोक। धर्मग्रंथ इससे भी आगे की बातें कहते हैं। विस्तृत वर्गीकरण के मुताबिक तो चौदह लोक हैं। सात तो पृथ्वी से शुरू करते हुए ऊपर और सात नीचे। ये हैं भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक , तपोलोक और ब्रह्मलोक। इसी तरह नीचे वाले लोक हैं-अतल, वितल, सतल, रसातल, तलातल , महातल और पाताल।
भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से गौर करें तो लोक् का रिश्ता अंग्रेजी के लुक (look) से भी जुड़ता है। लोक् धातु का मूलार्थ ही देखना है और अंग्रेजी के लुक का मतलब भी देखना है। अंग्रेजी का लुक प्राचीन जर्मन से आया है। यही बात लोचन में भी है। लोच् शब्द से बना है लोचन जिसमें भी देखने जिसका मतलब होता है आंखें जो देखने का काम करती हैं।
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लोकः से बने कई शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं। जैसे लोकतंत्र, लोककथा, लोकगाथा, लोकानुराग, लोकोदय, लोकपाल, लोकमत, लोकप्रिय, लोकनाथ आदि। यह सूची काफी लंबी हो सकती है।
अब अगर लोक् मे समाहित देखने , ज्ञानार्जन जैसे अर्थों पर गौर करें तो सबसे पहले मनुश्य के सामने प्रकृति के जो रूप आए वह थे अग्नि, वायु, पृथ्वी, वर्षा, सूर्य, पानी , संधिप्रकाश, आकाश , मेघ, बिजली, वनस्पति, पशु आदि। इसके अतिरिक्त मनुश्य के प्रत्यक्ष ज्ञान के दायरे में जो कुछ आया मसलन श्रम की विवशता, श्रम से जुडे़ उत्पादन का महत्व और उत्पाद की प्राप्ति, श्रम से जुड़े कला तत्व का ज्ञान, कला का कुशलता से मेल , कला का उत्पादन से मेल, कला से उत्पन्न रंजकता। इन तत्वों का मेल जब मनुश्य के जीवन में रच-बस गया तो जो जीवन शैली थी उसने संस्कृति का रूप लिया । दैनंदिन की कार्यप्रणाली अलग संस्कृति बनी और किन्हीं विशिष्ट अवसरों पर अपनाई जाने वाली शैली और तौर तरीके अलग संस्कृति बनीं। ये विशिष्ट अवसर ही पर्व कहलाए और शैली लोकाचार में ढल गई। लोक संस्कृति के मूल में यही सारी चीज़ें समायी हैं।
3 comments:
लोक के बहाने आपने ज्ञनवर्द्धक सामग्री परोसी है। बधाई।
एक निवेदन- कृपया कमेंट बॉक्स से वर्ड वेरीफिकेशन हटा दें, इससे इरीटेशन होती है।
बहुत ही समृद्ध लेख.जैसा आपने बताया लोक का मतलब नज़र डालना, तो उस हिसाब से ये अंग्रेज़ी के लुक शब्द से बहुत मिलता है.
बहुत खुब, इन का लाभ हम जेसो को ओर हमारे बच्चो को होगा, दिल से आप का धन्यवाद
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